ख़ाली घर है, घर में ख़ाली कमरा ,
कमरे में आलमारी पड़ी हुई है, ख़ाली
मै हूँ , थका बेबाक और बेबस …
भूखा हूँ ! खाने को भी कुछ नहीं ,
थाली और गिलास भी है ख़ाली,
बाहर कोई शोर नहीं, ना अन्दर ख़ामोशी है ,
वक़्त भी जैसे थम सा गया हो ख़ाली,
सोच रहा हूँ , थका हूँ , एक पहर सो जाऊ ,
लकड़ी का पड़ा तक्थ, है सख़्त और
एक पुरानी सी चादर बिछी है ख़ाली,
यहाँ से वहां ,जहाँ तक जाए नज़र ,
सब कुछ जैसे दिख रहा हो ख़ाली ,
और ग़मों से भरता मैं ,,
ख़ाली बैठा हूँ , बस ख़ाली “गुरुपाल चावला”
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