रविवार, 6 दिसंबर 2015

इमारत !!! (रै कबीर)

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है कैसी हमनें इमारत बनाई
क्रोध में तपी ईंट लगाई
रक्त से सींचा नींव को इसकी
मरी आत्मा आंगन दफनाई
भेदभाव की चारदीवारी
ईर्ष्या भाव से की चिणाई
क्लेश के हैं खिडकी दरवाजे
द्वेष की खूँटी लटकाई
पूजा घर में अधर्म विराजमान
पाप के दीए में लौ जलाई
भ्रष्टचार की छत व जंगले
तस्करी की सीढी चढाई
लालच भरी दीवार खडी है
मोह माया की पुट्टी करवाई
मन का गुल्लक भरा पाप से
वसीयत में है काली कमाई
है कैसी हमनें इमारत बनाई

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