नव उमंग, नव तरंग, नव उषा किरण छायी
योवन रूप लेकर, अस्र्णोदय की बेला आई !!
अश्वारोही हो दिनकर चला
नभ मंडल में लालिमा छाई
मुख मंडल पर दमकी आभा
चमक से धरा लगी मुस्काई !
नव उमंग, नव तरंग, नव उषा किरण छायी
योवन रूप लेकर, अस्र्णोदय की बेला आई !!
स्वर्ण रूप में बेला सजी
वृक्षों पर हरयाली छाई
प्रभात के अभिनन्दन में
लताओं ने छटा बिखराई !
नव उमंग, नव तरंग, नव उषा किरण छायी
योवन रूप लेकर, अस्र्णोदय की बेला आई !!
करलव की सरगम खनकी
देवदूतों में अब हलचल आई
वर सा रूप धर निकला भोर
मुख छिपकर निशा शरमाई !
नव उमंग, नव तरंग, नव उषा किरण छायी
योवन रूप लेकर, अस्र्णोदय की बेला आई !!
हिमालय का सीना चीरकर
सूरज ने जब रौशनी फैलाई
पीतांबर सी चमकी शिलाये
जैसे मस्तक पे चंदन लगाईं !
नव उमंग, नव तरंग, नव उषा किरण छायी
योवन रूप लेकर, अस्र्णोदय की बेला आई !!
शबनम की बून्द छिटकी जब
पुष्प खिले कलियाँ कुम्हलाई
कुहासा की किरण लगी छटने
पवन ने भीनी सुगंध बिखराई
नव उमंग, नव तरंग, नव उषा किरण छायी
योवन रूप लेकर, अस्र्णोदय की बेला आई !!
नित्य करती तुमको ये प्रेरित
हे ! मानव जन अब तू इससे ले कुछ सीख
नवजीवन नित्य देता सन्देश
उठो ! जागो ! कर्म की शुभ बेला जाए न बीत !!
नव उमंग, नव तरंग, नव उषा किरण छायी
योवन रूप लेकर, अस्र्णोदय की बेला आई !!
!
!
!
—::—डी. के. निवातियाँ —::—
Read Complete Poem/Kavya Here अस्र्णोदय की बेला...........
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें