याद नही क्या क्या देखा था हमने तुममे ऐ हमदम
तुम हो मसरूफ अपनी खुशियों मे फिर से तनहा रह गए हम
याद नहीं क्या क्या देखा था हमने तुममे ऐ हमदम
क्या खूब हसीन दिन था वो मिले थे जब तुम हमें
सोचते थे के छुपा के रख ले हम उस लम्हे को दामन में
काश छुपा लेते उस वक़्त को तो वक़्त जाता थम
याद नहीं क्या क्या देखा था हमने तुममे ऐ हमदम
हर पल यही सोचते हैं के तुझे चाहे इस कदर
तेरी पलकों मे ढूंढ़ते हैं आज भी वो पहली सी नज़र
खो गयी वो निग़ाहें कहीं जिन्हे कभी चाहते थे हम
याद नहीं क्या क्या देखा था हमने तुममे ऐ हमदम
तेरी चाहत ने हमे छोड़ा न किसी ओर के काबिल
आज भी मिलते हैं राह मे लाखो हज़ारो दिल
ढूंढा करे कोई कंधा हम सुनाने को अपना गम
याद नहीं क्या क्या देखा था हमने तुममे ऐ हमदम
शनिवार, 9 जनवरी 2016
एक बीता हुआ पल
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ भेजें (Atom)

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें