ग़ज़ल –
अपना वो दामन बचाकर चल दिए
जब मिले नज़रें चुराकर चल दिए !
दिल में चाहत लेके आए थे मगर
दर से उनके चोट खाकर चल दिए !
अब यकीं उनकी जुबाँ का क्या करे
जो फ़क़त सपने दिखाकर चल दिए !
मौसम-ए – गुल की तरह आए मगर
गुंचा-ए -दिल वो खिला कर चल दिए !
जब भि गुज़ रे वो मेरे नज़दीक से
ज़ुल्फ़ की ख़ुश्बू उड़ा कर चल दिए !
बन के दुश्मन देखने आए मगर
मेरे हक़ में वो दुआ कर चल दिए !
जब मिले तन्हाईओं में वो “रज़ा ”
दर्द – ए – दिल सुनकर चल दिए !
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फ़क़त ! सिर्फ़
मौसम-ए – गुल ! फूलों का मौसम
गुंचा -ए -दिल ! दिल की कलियाँ
by shayar salim raza 9981728122
Read Complete Poem/Kavya Here अपना वो दामन बचाकर चल दिए - GAZAL SALIM RAZAV REWA
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