रविवार, 11 अक्टूबर 2015

पुरुषार्थ -औचित्य कुमार सिंह

देखो पूर्व में लाली छाने लगी है
घास पर पड़ी ओस की बूंदें
सिकुड़ रहीं हैं –
भोरों तितलियों ने तोह लेना शुरू कर दिया है
क्योंकि अब तक रात से शरमाई कलियाँ
खिलने ही वाली हैं ;
पक्षियों के बच्चे
घोंसलों से देख रहे हैं
अपने अभिवावकों को उड़ते ।

कहीं दूर से शंख की ध्वनि आ रही है
जल्द धुप फ़ैल जाएगी
सारे खेतो पहाड़ो पर-
चमकेंगी खेतो में खड़ी बालियाँ ।
सितारे जिनके साथ सबका भाग्य है
और आसमान में कहीं दफन हो गए हैं
कड़ी निगाहें रखे हैं इंसानों पर
निश्चिन्त रहो
सबके भाग्य का सितारा बुलंद है
बस तुम्हारे पुरुषार्थ की देर है ।
-औचित्य कुमार सिंह (16.06.2006)

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