मंगलवार, 6 अक्टूबर 2015

क्रेनें

सामने दीखते क्रेनों के ये विशाल हाथ
अभयदान से
मूर्त विज्ञान से
उमड़ते शहर के ऊपर।
प्रकाशित
स्वयं में
उत्सव, लाल रंग में झुलसते।
इनके नीचे पसीना बहाते हैं
मजदूर, उनकी औरतें और बच्चे,
तपती धूप में छाया ढूंढते हैं
और ढूंढते हैं
अपनेपन का दुलार
उड़ती धूल में।
और ढूंढते हैं सोंधापन
गरम तपी सड़क में ,
बहलाते हैं खुद को
ढूंढकर
परती पड़ी मिट्टी का स्वाद,
परती ही तो है ।

छीजती धूप इन हाथों से
थोड़ी विरल है
ठंडकहीन,
पर इसी में अब अस्तित्व का भान है।
यहीं पुराने हल, बैल
यहीं वो चौपाल है
हुक्का गुड़गुड़ाता था
चिर क्लान्तिहीन मन सा
बाबा का, काका का, दक्खन वाले ताऊ का
मतिया के पायने का ।

संसार बदला नहीं
नष्ट हो गया है
और उसकी जगह
नया बसाया जा रहा है,
इन क्रेनों के सहारे
औचित्य कुमार सिंह (06.10.2015)

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