शनिवार, 10 अक्टूबर 2015

अलग तजुर्बा...!!

मरकर देखना चाहता हूँ मैं,
लेकिन ये तजुर्बा तुम्हें कैसे बताऊँ….!!
स्वर्ग मिली है मुझको,
या फिर नरक के दरवाज़े पर खड़ा हूँ…!

सजा तो ज़मीं पर काट ली मैंने,
दे दे अब ईश्वर तू ज़िन्दगी दोबारा
इसी ज़िद पर अड़ा हूँ ..!!

ऐसी गज़ब नींद में हूँ,
ख्वाब का अंत (नहीं) क्या बताऊँ..!!
ईश्वर से मिलकर मुझे,
करना है सवाल-जवाब, इसलिए मरा हूँ..!

तजुर्बा तुम्हें बताना चाहता हूँ,
तमाशा देखो, आओ मरकर तुम्हें दिखाऊं…!!
मय्यत पर आ जाना सब,
तुम लोगों से ही तो क़तरा-क़तरा जला हूँ..!

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