।दोहे।।किसान के प्रति।।
R.K.MISHRA
दिनकर से पहले उठत,होय न देत अंजोर ।
राम कृषक जन जात है,निज खेतोँ की ओर ।।
चना चबैना चल दिये,गमछा अउर कुदाल ।
राम लिये गुड़ पोटली,चलते मधुरिम चाल ।।
आलू बोये होत हैं ,आलू के ही पेड़ ।।
राम कभी निज श्रम बिनु,जामि सके न रेड़ ।।
पौधों की अति दुर्दशा, मेड़ी दियो बिगाड़ ।
राम सूअर वन रात में, पौधे दिये उखाड़ ।।
राम दुःखी अति दीन उर, वाणी गयी सुखाय ।
मेहनत का फल न मिले, मन ही मन पछताय ।।
निरखि निरखि निज खेत को ,लगी धूप अकुलात ।
राम चबेना मेड़ पर, पड़ा रहत बसियात ।।
चूंटो की लश्कर चली, कौआ बोले काँव ।
राम गुड़ै पर माति गै, करते रहत खिंचाव ।।
कबहू सूखा बाढ़ तो, कबहु होत अतिवृष्ट ।
राम किसानी भाग्य के, होतै रहत अनिष्ट ।।
जिह किसान उपजात है, फसल अनेक प्रकार ।
राम वही भुखमरी के, होते यहा शिकार ।।
जो किसान सम्मान बन , थे भारत की शान ।।
राम बने मजदूर है, छोड़ खेत खलिहान ।।
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