गुरुवार, 8 अक्टूबर 2015

आह्वाहन - औचित्य कुमार सिंह

मेरे राग उठो निस्तेज पड़े ,
मेरे गान उठो निर्वेग खड़े ,
क्या लाभ तुम्हारा निहित कहो
आवेग बनो बन ज्वाल बहो |

हैं ध्यानमग्न सब स्वसंधान में
बहते हैं सब निज धार आन में ,
उद्वेलित कर दो इसी तान में
झूमे सब हो एक तान में |

रे मेरे गुथे भाव स्वरोँ-
उत्साह वेग रोर भरो
द्वन्द भर उत्थान करो,
मस्तिष्क में हित ज्ञान भरो |
– औचित्य कुमार सिंह

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