मंगलवार, 6 अक्टूबर 2015

।।ग़ज़ल।।सज़ा किसने नही पायी।।

।।ग़ज़ल।।सज़ा किसने नही पायी।।

किसी को ग़म दिया बेसक किसी की आँख भर आयी ।।
तेरे उन शुर्ख होठो की सज़ा किसने नही पायी ।।

तेरी नज़रो की छाया में सकूने इश्क़ फ़रमाते ।।
तेरी रश्मे मुहब्बत में कसम किसने नही खायी ।।

पलक झपके अदा तेरी कि पहले ही बदलती थी ।।
न समझे लोग नाज़ुक दिल मिली सबको ही तन्हाई ।।

गयी तू लूट महफ़िल को ज़रा सी रौशनी देकर ।।
बड़ी तकलीफ़ देती है तेरी बेबाक़ तन्हाई ।।

मेरा वो शक सही निकला दिलो के खेल होते है ।।
यहा सजती मुहब्बत में गमो के नाम सहनाई ।।

उन्हें आगाह कर दू मैं जिन्हें है नाज़ जिश्मो पर ।।
किये उनके गुनाहो की करूँ कब तक मैं भरपाई ।।

मग़र ये याद रख हमदम सज़ा तुमको भी है वाज़िब ।।
तेरा मज़ाक कर देगी वो तेरे दिल की मंहगाई ।।

R.K.MISHRA

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