जागो रे जगती जागी,
सोम गया, गयी यामिनी;
अंशुमाली यों निकल निकल
भेंट रहा कर कामिनी ।
प्रतीत प्रतिबिम्ब रक्तवर्ण, मधुसूदन उज्जवल तरनि में,
बहा प्रीत पवमान, सधा सरोज, गा उठा प्रभात अवनि में;
द्विज चहके, देख प्रमदा आगमन महका अहा आराम-
दग्ध दिवाकर देख भूमि को देख रहे निज धाम।
पलको पर रख सपने निसार
तुम सजा रहे प्रियतमा हार,
बाकी सब जग जीवन बिसार
अब तक सोये क्या सार !
-औचित्य कुमार सिंह

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