शुक्रवार, 9 अक्टूबर 2015

ईश्क- ek Gajal

चाँद निकलता है तब कभी सवेरा नहीं होता
किसी को चाहने भर से कोई मेरा नहीं होता

माना कि ईश्क में जलते हैं हजार दिल
दिल जल रहा हो गर कहीं, अँधेरा नहीं होता

प्रेम का एक बाँध बना लो आज वासना पर
कमजोर किसी डाल पर बसेरा नहीं होता

महल खडै नहीं होते जुल्म के जोर पर
सांप पालने से कोई सपेरा नहीं होता

दिल खेल नहीं पर दिल का खेल है निराला
दिल का चोर कभी किसी का मौसेरा नहीं होता

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