चाँद निकलता है तब कभी सवेरा नहीं होता
किसी को चाहने भर से कोई मेरा नहीं होता
माना कि ईश्क में जलते हैं हजार दिल
दिल जल रहा हो गर कहीं, अँधेरा नहीं होता
प्रेम का एक बाँध बना लो आज वासना पर
कमजोर किसी डाल पर बसेरा नहीं होता
महल खडै नहीं होते जुल्म के जोर पर
सांप पालने से कोई सपेरा नहीं होता
दिल खेल नहीं पर दिल का खेल है निराला
दिल का चोर कभी किसी का मौसेरा नहीं होता

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें