सोमवार, 5 अक्टूबर 2015

सच्चा साथी

भूल कर जो भूल हुई
भूल गए अन्जान समझकर
जो ख्वाब सजाकर रखे थे
रह गए अरमान अटक कर
थी खता हमारी इतनी सी
पत्थर पर बीज उगाया था
वो फूल कभी भी खिल ना सका
जज्बातो से जिसे सिंचाई या था
हम भूल गए कुछ पल के लिए
शीशे तो टूटा करते है
है वक्त वक्त के साथी सब
साये भी रूठा करते है
मै बूँद बनी उस सागर की
जो प्यास कभी बुझा ना सका
अपने ही अक्ष इस मोती को
दिल से कभी अपना ना सका
पछतावा तो होगा खोकर
अपने अमूल्य खजाने को
मोती पर क्या फर्क पडा
दुनिया भागे अपनाने को
सागर की खता है या दिलदारी
है प्रीत ये उसकी दुनिया से
या फिर मोती से गद्दारी
हो कष्ट भले ही मोती पर
पर अपनी चमक छिपा ना सका
जो जग मे उजाला करते है
वो नाम कोई मिटा ना सका
मै भूल जाऊ उसको एक दिन
कैसे भूले एहसान को
जो दर्द वो मुझको देकर गया
कहता है कदम बढाने को
वो है सच्चा साथी मेरा
जो मुझको चलना सिखाता है
अपनी कडवी सी बूटी से
मेरे दोष मिटाता है
साथी वही जो आगे रहे
गिरते कदम उठाने को
सारा जंहा है आगे खडा
झूठी वाहवाह लूटा ने को
प्यार सच्चा है सागर का
मोती को चमकना सिखाता है
वो प्यास भले ही बुझा ना सका
बनकर बारिश जो बरसे पानी
तो धरा को खुशहाल बनाता है
है उस पत्थर की दिलदारी
जो सही दिशा दिखाता है
पत्थर मिसाल है दृढता की
तभी तो पूजा जाता है
ना देखो नीम की कडवाहट
वो रोग मिटाने वाला है
सच्चा साथी अन्धकार मे
प्रकाश दिखाने वाला है
है एहसास तेरे कष्टो का
वो खुशिया लाने वाला है

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