मंगलवार, 13 अक्टूबर 2015

गुलामी हमे रास आ गयी.....

बनकर रह गए हम जैसे सर्कस के शेर !
कुछ इस तरह गुलामी हमे रास आ गयी !!

आजादी का सिलसिला कुछ इस कदर चला
किस किस की जान गयी और किसका हुआ भला…!
वतन पे मरने वालो की निशानियाँ मिट गयी,
जब से गद्दारो के हाथ सत्ता की बागडोर आ गयी …!!

बनकर रह गए हम जैसे सर्कस के शेर !
कुछ इस तरह गुलामी हमे रास आ गयी !!

ना पूछो किस कदर फैला है रिश्वतखोरी का जाल ,
बेईमानो की तिजोरिया हुई है दौलत से मालामाल …!
इमानदारो के धरो में भुखमरी पैर जमा गयी
आज झूठ और लालच के आगे सच्चाई सरमा गयी …!!

बनकर रह गए हम जैसे सर्कस के शेर !
कुछ इस तरह गुलामी हमे रास आ गयी !!

टुकड़ो में बाँट दिया मुझको मेरे ही सपूतो ने
एक जैसा था खून सबका फिर क्यों बटगए हिन्दू-मुसलमानो में ..!
ना जाने लगी किसकी नजर जो दिलो में बेरुखी आ गयी,
ये किस कदर मेरे देश में राजनीति छा गयी …….!!!

बनकर रह गए हम जैसे सर्कस के शेर !
कुछ इस तरह गुलामी हमे रास आ गयी !!

मजहब का दानव आज हुआ कितना जवान
बात बात पर होते आज कत्लेआम यहां ….!
नफरत की आग इस कदर जमाने में लग गयी,
जो बनके डायन आज अपने ही बेटो को खा गयी ….!!

बनकर रह गए हम जैसे सर्कस के शेर !
कुछ इस तरह गुलामी हमे रास आ गयी !!
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[[_______डी. के. निवातियाँ _____]]

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