मंगलवार, 13 अक्टूबर 2015

मन, तू क्या है?

मन, तू क्या है?
कामना तरंगों से निर्मित
स्वार्थ पवन के रुख पर चलता
एक सागर अनंत है?

तू क्या है, मन!
स्याह भाव टुकड़ों से आच्छादित
सीमित वासनाओं को पालता
सूना एक गगन है?

मन, तू क्या है?
छनती किरणों के प्रांगण में
सांयेसांये करते किसी वन में
सुवासित एक नीरव सुमन है?

बता मन, तू क्या है?
अंधकार के शहर में
निर्जन एक खंडहर में
तडपता एक दीया है?

मन, कौन है तू आखिर?
निरर्थक है क्या अस्तित्व तेरा?
हृदयहीन इस जगत में
क्या बेकार ढो रहा तुझे यह तन मेरा!

– Uttam Tekriwal

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