एक ओंकार हरे हर पीड़ा
अहंकार बड़ा जहरीला कीड़ा
मर्यादा पुरुषोत्तम जब बस राम है
राम ही सब अहमों का धाम है
अगर नियती से बंधे हैं सारे करम
समर्पण से वृहद् नहीं है कोई धरम
हजारों शीश मेरे गिरे राम के चरण
करें राम हर कर्म की मर्यादा का हरण
मन घिर रखा है तम के बादल में
ईर्ष्या, द्वेष, घृणा, क्रोध सम् दलदल में
समर्पित हो हर कृष्ण, जो बसता हर पार्थिव में
लो सारे विष फिर सिमट रहा है शिव में
प्रेम की तृष्णा में जब सब रंग जाते हैं
सारे अंधेरे तब कृष्ण में खो जाते हैं
हार कर अस्तित्व अपना, जो सर्वस्व पाता है
जो हरे हर तम को, वो हरि कहलाता है
हरे कृष्ण मन का
हरे कृष्ण जीवन का
हरे कृष्ण कण कण का
रमे यही मनका मनका

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