सोमवार, 5 अक्टूबर 2015

शून्य

हर जगह बस शून्य शून्य ही रह गया है
जो भी था अस्तित्व मेरा, आज छिन गया है।
मैं तुम में तुम मुझ में सिमट गया।
ज्ञात अज्ञात, व्यक्त अव्यक्त में मिट गया।

निस्तब्ध शांत स्थिर ये कैसी उर्जा है
आकर्षित करती जो ॠष्टि का हर पुर्जा है
अजब पहेली सा उलझाने लगते हैं हमें
बोलो, श्याम क्यों सुहाने लगते हैं हमें!

मिट कर ही सृजन का आव्हान होता है।
नव दिशा भव् सूर्य का निर्माण होता है।
कृष्ण की रचना विशद निरंतर अपरम्पार है।
शून्य से निकल कर हमें शून्य में मिलना लगातार है।।

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