सोमवार, 5 अक्टूबर 2015

ख्वाब

बुन रही है
कोई ख्वाब जिंदगी
जिनमे खामोशियों के
पड़े हैं कुछ बूटे
और सुख दुःख के
फंदे दो रगें हैं
यादों के सुनहरे
सपनो के धागे
जिसको आधा-आधा
आपस में बांटे हैं
कुछ बुन लिया है
कुछ बुनने को बाकी हैं
सपनो के धागों के सिरे लम्बे है
गांठें पड़ी हैं छुपा लिए तुमने
तेरे बुनने की तरकीब निराली है

shweta misra

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