एक बार फिर
सूरज,गंदला सा मुँह छिपाते
उगने की कोशिश में लगा है,
न स्वर्णिम प्रभात, न उषा का अरुणिम चीर
सिंदूरी सुबह कतरा गई।
एकाएक मद्ध्मि प्रकाश लिये
आसमान में सूरज गोचर हुआ,
दिवस के कुछ पहर झुठलाता,
जैसे पीछे से ढकेला जाता।
अब तो एैसे ही सुबह होगी,
शायद कुछ पहर बाद!
स्वर्णिम प्रभात देखने
चढ़ना होगा शिखर पर,
उॅंचे पहाड़ पर,
धूल-धूसरित वायुमंडल के उपर!
ललजी वर्मा
Read Complete Poem/Kavya Here गंदला सूरज
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