मंगलवार, 13 अक्टूबर 2015

मायावी रातों में

एक चश्मा देखा है सपनों का तेरी आँखों में
एक खुशबु सा बसा है मन तेरे साँसों में

मुझे याद है वह मुलाकातों की महफिल सूरिली
मन के तारों को छेड़ा था किसी ने बातों ही बातों में

हर खंजर का वार है फिजूल अब तो
मिठास ही आती है आघातों में

उडते पंछी भी ढूंढ लेते हैं बसेरा साँझ ढले
तडपता मन फुदक रहा अब तक मायावी रातों में

– Uttam Tekriwal

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