चन्दा कहता, आज
मुझको पास बुलाकर
वह देखो एक स्त्री खड़ी है
कैसे हाथ फैलाकर ;
वह नितदिन दुखी रही है,
नए नए कष्टों से,
उसको दुखी किया गोरों ने
नए नए चक्रों से;
आज तो उसके स्व पुत्रजनों ने
उसको तंग किया है,
भ्रष्टाचार और धर्मोन्माद से
उसका खून पिया है।
– औचित्य कुमार सिंह

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