शनिवार, 10 अक्टूबर 2015

मैं विलीन होता हूँ जग में -औचित्य कुमार सिंह

मैं विलीन होता हूँ जग में
मैं चिल्लाता हूँ फंसकर
गहरे जीवन में बंधन में
जहां छद्मता और नाट्य है –
मैं विलीन होता हूँ जग में ।

दुःख के मोती, सूनापन
यहीं गहनता, यहीं विजन
चिल्लाता हूँ आँगन में ,
मैं सिक्के ढोता हूँ वन में ।

निराधार तिनको को लेकर
सेता हूँ उनको कानन में
बार बार जीवन पिन्घलाकर
मैं सजीव होता हूँ वन में ।

कच्चे धागे को कच्चा पाकर
बार बार खुद को बहलाकर
रहता हूँ हरदम अंधड़ में
मैं जीवन जेता हूँ भ्रम में

जब मैं कहता मैं गता हूँ
तब भी आंसूं ही पता हूँ
हाँ ये पाता इस मन में
मैं बस रोता हूँ जीवन में ।

मैं विलीन होता हूँ जग में
-औचित्य कुमार सिंह

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