सोमवार, 5 अक्टूबर 2015

खत्म

सूरज की गरम रोशनी
हवा का अपनापन
फूलो की खुशबू का साथ
सब पहले जैसा है
कुछ तो खत्म नहीं हुआ
बिखरे सपनों की आंच
सूखे कुएं सी प्यास
ठण्ड में ठिठुरती हंसी
रात में चांदनी सा जगता प्यार
खत्म होने सा सवाल ही नहीं
बनता

तो तुम्हे क्यूँ लगता है
तुम्हारा जाना
मेरे सब कुछ खत्म कर सकता है

तुम्हारे जाना से क्या?
हमें बंधने रखने वाला एहसाह
नहीं रहा
चहरे दर चहरे में तुम्हे देखने की
तेरी आहट सुनाने की
चाहत तो खत्म नहीं हुई

रिंकी राउत

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