सोमवार, 5 अक्टूबर 2015

दीदार

घूंघट की आड में ऐसा क्या छुपाते हो
इक झलक की आस में कितना लुभाते हो
तेरी छवि से ही मदहोश पड़े हैं कई दिवाने
गहरी जुल्फों को झुका कर और क्यों सताते हो

रूप के चर्चे हुए हैं आम हर महफिल में
तारीफ के नगमों को अधूरा क्यों बताते हो

तेरी आभा से ही स्वर्णिम है जिन्दगी
यूँ बेदर्दी से दिल की लगी को क्यों बुझाते हो

दर दर भटक कर ढूंढा है तेरा ठिकाना
दिल की जमीन से दूर बसेरा क्यों बनाते हो

माना कि साँसे अटकी हैं तेरी हर अदा पर
अपनी अदाओं पर इतना क्यों इतराते हो

प्रेम के असीम दरिया के पार है मंजिल तेरी
डूब कर मर मिटने से नादान दिल क्यों घबराते हो

समर्पण का तिनका ही ले जाएगा भवसागर के पार
दिल के दर्पण में ईश्वर की परछाइयाँ क्यों बनाते हो

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