कहकर कितना कह पाउँगा
जता सकूंगा कैसे तुमको
सब कुछ जो मेरे मन में है
मैं कैसे बोलूंगा वो जो
खुद को ही ना समझा पाया
कैसे ढूंढूंगा मैं शब्दों को
कैसे सब कुछ सुलझा दूंगा ।
कितना तुम मेरे मन में हो
कैसे तुमको मैं जीता हूँ
पल पल आँखों में भरकर तुमको
कैसे मैं सपने बुनता हूँ
कैसे मेरी यादो में तुम
हरदम हंसती गाती रहती हो
कितना प्यार तुम्हे करता हूँ
कैसे तुमको समझा दूंगा
कहकर कितना कह पाउँगा ।
– औचित्य कुमार सिंह

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