मंगलवार, 13 अक्टूबर 2015

कहकर कितना कह पाउँगा

कहकर कितना कह पाउँगा
जता सकूंगा कैसे तुमको
सब कुछ जो मेरे मन में है
मैं कैसे बोलूंगा वो जो
खुद को ही ना समझा पाया
कैसे ढूंढूंगा मैं शब्दों को
कैसे सब कुछ सुलझा दूंगा ।

कितना तुम मेरे मन में हो
कैसे तुमको मैं जीता हूँ
पल पल आँखों में भरकर तुमको
कैसे मैं सपने बुनता हूँ
कैसे मेरी यादो में तुम
हरदम हंसती गाती रहती हो
कितना प्यार तुम्हे करता हूँ
कैसे तुमको समझा दूंगा

कहकर कितना कह पाउँगा ।
– औचित्य कुमार सिंह

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