सोमवार, 5 अक्टूबर 2015

प्यार की बरसात

मन की छत पर बज रहा था यादों की बूँदों से नित नए धुन
गीली मिट्टी से सने थे हाथ नयन के कई सपनों को बुन

गोरी के कारे केश जैसे लहरा रहे हैं ये बादल
हवाओं में सौंधी महक मिलन की, बनाते मन को पागल

बौछारों ने सारे गर्द धो डाले अहम के आज
प्रकृति का प्रेम की तृष्णा मिटाने का एक व्यर्थ प्रयास

देखो, आशा की खिड़की से फिर झाँक रहा मन सूरज बन कर
प्रेम की उद्घोषना हुई है इंद्रधनुष के सतरंगी परचम पर

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