सोमवार, 5 अक्टूबर 2015

चुनाव के दिन

ना किया मना सूरज मे
जग का तिमिर मिटाने को
नदियो ने खोली बाहे
सबकी प्यास बुझाने को
पर्वतों ने भी दिये खलिहान
जीवो की क्षुधा मिटाने को
ना सूरज ने नखरे रखे
ना नदियों ने इन्कार किया
पर्वतों ने भी अपनेपन का
टूटकर भी प्रसार किया
फिर इन्सान क्यो जंहा मे
झूठे परचम लहराता है
किस कारण से हम मे
अहंकार आ जाता है
नदिया है महान जग मे
जो जग के पाँव सहलाती है
फलो से लदी डालिया भी स्वार्थ रहित हो
खुद नीचे झुक जाती है
धरती ने ना किया घमंड
जग का बोझ उठाने को
फूलो की खुशबू भी होती
इस जग को महकाने को
ना सूरज सा तेज
ना झरने सी शीतलता
ना पर्वतों सी है दृढता
ना फूलो सी सुन्दरता
ना सर्वज्ञ होता कोई
ना नदियों सी निर्मलता
प्रकृति ने ना किया घमंड
तो हम कैसे दिखाया करते है
क्यो अहंकार मे भरकर
ना शीश नवाया करते है
आत्मसम्मान जग मे यारो
इन्सान को महान बनाता है
अहंकार कारण अवनति का
बस सर्वनाश करवाता है

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