रविवार, 9 अगस्त 2015

खुशनुमा पल

वो खुशनुमा पल
कैसे भुलाए भुला जाता
जब एक पुत्र अपने पिता के
जरुरतो को पुरा कर सकता है
किसी की मुखदर्पन में
संतुष्ति के झलक देख के
मन प्रसन्न हो उठता है
कोई मेरे दर्दे दिल को कैसे समझे
मैं सबके लिए कुछ करना चाहता हुं
पर मुझ से हो न पाता
चीजों से भरी हुई बाजार
दिल में अनगिनत सपने
पर हथेली है खाली
करे भी तो क्या करे
दिल को मार के जीना पड़ता है
अरमानों का गला घोटना पड़ता है
उम्मीद की किरण नजर नही आती
मौका भी दूर भागता है हमें देख के
शायद वक्त हमारा भी आयेगा
आयेगा एकदिन
जिस दिन में सिर्फ मेरा ही नाम लिखा होगा
लेकिन………
देखने के लिए
सुनने के लिए
सराहने के लिए
कोई न होगा……..
जा चुका होगा
बहुत दूर….
जिन सब के लिए मैं कुछ करना चाहता था….
किसको मिलेगी खुशी
क्या होगा तब
कु्छ बनु तो अभी क्यों न बनु
जो खुशनुमा पल मैं…
अभी सबके साथ बिता पाऊ
पर होता कब है
किस्मत कोई किसी को ही अजमाता है
है न???

-किशोर कुमार दास

Share Button
Read Complete Poem/Kavya Here खुशनुमा पल

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें