रविवार, 9 अगस्त 2015

डोर

तुम मेरे जिन्दगी में आये
जैसे मैं खिल उठा
जब तुम्हें मैं नजदीक से जाना
मैं तुम्हारा और करीब होता गया
इतना करीब की
बिछड़ने का डर
हर रोज पनपता है
तुम्हारी हंसी,
तुम्हारी बातें
मेरे दिल में गम का घर बनाने नहीं देता
तुम्हारी बचपना को मैं
यूं ही नजर अंदाज कर जाता हुं मैं
तुम्हें खुश करने के लिए
जी जान लगा देता हुं मैं
कहां चली जाती हो तुम हर रोज
क्यों जाती हो?
बगैर तुम्हारे जी नही लगता मेरा
मेरे कारण
हां मेरे ही कारण शायद
तुम बाहर निकल चुकी हो
डर को कलेजे में छुपाए
दर्द को सीने में दफनाए
न वो दिन आता
न तुम्हें मैं कुछ बताता
तुम पास होते हुए भी
जैसे मुझसे दूर रहती हो
तुम्हारी खिला हुआ चेहरे को
मैंने कुचल डाला रोंड डाला
फुलों से सेज बिछाने गया था
कांटों से भर गयी
अंजाने में न चाहते हुए भी
अब तुम वहां मैं यहां
दोनों को बांधे हुए
एक पतली डोर…..
कब टूटे पता नहीं!!!!

Share Button
Read Complete Poem/Kavya Here डोर

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें