सोमवार, 6 जुलाई 2015

लुटे से नजर आये... (ग़ज़ल)


    1. इस जिंदगी के नजारे हमे कुछ ऐसे नजर आये !
      जिसमे हम सम्भलते कभी बिखरते नजर आये !!

      जब न जिस्म अपना था, न ही जान अपनी थी !
      फिर क्यों हम इससे जद्दोजहद करते नजर आये !!

      फैला दिया वक़्त ने हर लम्हे को कुछ इस तरह !
      जिंदगी के हर मोड़ पे खुद सिमटते नजर आये !!

      क्या औकात थी किसी की जमाने में हमे खरीदे ! .
      प्यार के चन्द लफ्जो में हम बिकते नजर आये !!

      जब सब कुछ था किसी और का “धर्म” जमाने में !
      फिर क्यों सबको यंहा पर खुद लुटे से नजर आये !!
      !
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      डी.के. निवातियाँ _____@@@

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