रविवार, 5 जुलाई 2015

हवा की सरसराहट

ये हवा की सरसराहट के असर है कैसे कैसे
किसी दिल को लगते मीठे किसी दिल को सूल जैसे
कुछ कह रही हैं फिर से ये खामोश काली राते
कोइ सुन के इनको हर्षे कही नैना दर्द बरसे
ये……….
चल दिये हैं फिर से मगरूर बादल बन के
किसी तन पे इसकी बून्दे पड़े तो सोले भड़के
कही जख्मी दिल के जख्मो को फिर से ये कुरेदे
लगने लगे वो प्यार फिर आज दर्द जैसे
ये………
कड़कने लगी है बिजली
तूफान उठा दिल में
कही दो जिस्म आज लिपटे
कही तड़पे फिर दिल के टुकड़े
करने लगे हैं हरकत ये कुछ सौतेले जैसे
ये़………..
ऐ दिल क्या नही बन सकते
हम फूलो के चमन डाली से
जो छूट गए उसे भूल फिर जने कली प्यारी से
आजा कदम बढाए फिर एक नए रस्ते पे
भुला दे हम उसको जो भुलाए हैं हमे कबसे
ये………

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