रविवार, 5 जुलाई 2015

गाँव में बिता स्वर्णिम दिन

वो नदी की किनारे
कल कल बहती जल धरा
रेतो में मंदिर कभी घर बनाना
दोस्तों के साथ उछल- कूद करना
पनघट में पिया से मिलना
वो नटखट बच्चपन के दिन
आज भी खूबसूरत लगता है
गाँव में बिता स्वर्णिम दिन …………

दादा -दादी की परियो वाली कहानियाँ
यशोदा जैसी माँ की ममता
पापा के साथ पूर्णिमा की मेला
घर में किये शरारत -शैतानियाँ
आँगन बैठ चंदामामा को पुकारना
बिल्ली को मौसी रानी कह के बुलाना
कौआ को प्यार से रोटी खिलाना
चिड़िया कबूतर के लिए दाने डालना
था दिल के करीब बेहद
गाँव में बिता स्वर्णिम दिन …………

वो लुका छुपी का खेल
मिटटी की अनेक खिलौने
बागो में तितली को पकड़ना
चोरी-चोरी अमवा को तोडना
शाम को गेहू के खेतो में घूमने जाना
मित्रो के साथ गिल्ली डंडा खेलना
नील आकाश में पतंग उड़ाना
गाँव में जादूगर आने पर शोर मचाना
पिकनिक के बहाने पाठशाला न जाना
मित्रो के साथ जंगल में मंगल करना
गली मोहल्ले में फेरे लगाना
हर पल बहुत खूबसूरत था
गाँव में बिता स्वर्णिम दिन …………

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