बचपन की यादें दिल में आते ही हो जाता हूँ उदास
पुराना वक़्त वापिस नहीं आता इसीलिए मन रहता है निराश
उन दिनों में न मोबाइल था, न इंटरनेट था और न था टीवी का शोर
स्कूल जाओ,दोस्तों के साथ मस्ती करो, कोई भी नहीं होता था बोर
मन में एक अजीब सी बैचेनी सी रहती हे जबकि सबकुछ है पास
पुराना वक़्त वापिस नहीं आता इसीलिए मन रहता है निराश
जैसे जैसे आगे बढ़ने की कोशिश करता हूँ , कदम नहीं देते हैं साथ
अब तो ये आलम है, छोड़ देते हैं वो भी जो लगते हैं बहुत खास
कुछ इस तरह से उलझ कर रह गयी है जिंदगी, सबकुछ लगता है इक परिहास
पुराना वक़्त वापिस नहीं आता इसीलिए मन रहता है निराश
जहाँ देखो वहीँ सब भाग रहे हैं मंजिल का किसी को पता नहीं
अपने भी पराये हो गए हैं , इस दुनिया में कोई किसी का सगा नहीं
धन दौलत , नाम, इज़्ज़त है फिर भी नहीं भुझ्ती है ये प्यास
पुराना वक़्त वापिस नहीं आता इसीलिए मन रहता है निराश
सुनो हित की बात, जो कल थे वो आज नहीं , और जो आज हैं वो कल नहीं
सब कुछ हासिल कर लिया लेकिन ख़ुशी एक दो पल नहीं
बचपन की खुशी आये एक बार फिर, और हो आज के हो गम का नाश
पुराना वक़्त वापिस नहीं आता इसीलिए मन रहता है निराश
हितेश कुमार शर्मा
Read Complete Poem/Kavya Here वक़्त -तब और अब
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें