तमन्ना जाग उठती है तेरे कूचे में आने से
तेरे चिलमन हटाने से जरा सा मुस्कुराने से ||
अजब ही दौर था जालिम ग़ज़ल की नब्ज़ चलती थी
मेरी पलकें उठाने से तेरी पलकें झुकाने से ||
कहीं जाओ मगर अच्छे मकां मिलते कहाँ हैं अब
हमारे दिल में आ जाओ, ये बेहतर हर ठिकाने से ||
पतंगों सा गिरा कटकर तेरी छत पर अरे क़ातिल
कि बाहों उठाले तू किसी तरह बहाने से ||
हमारे नाम से साकी सभी को मय पिला देना
सितारे रतजगा के हैं थके -हारे जमाने से ||
परेशां हो पशेमां हो यही पूछे जवाबी ख़त
लिखावट क्यूँ नहीं जाती तेरे ख़त को जलाने से ||
लुटा शुहरत गवां दौलत मजे में ‘सारथी’ देखो
अमीरी है फ़कीरों सी घटेगा क्या लुटाने से ||

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें