शनिवार, 8 अगस्त 2015

|| ग़ज़ल सारथी || तमन्ना जाग उठती है तेरे कूचे में आने से

तमन्ना जाग उठती है तेरे कूचे में आने से
तेरे चिलमन हटाने से जरा सा मुस्कुराने से ||

अजब ही दौर था जालिम ग़ज़ल की नब्ज़ चलती थी
मेरी पलकें उठाने से तेरी पलकें झुकाने से ||

कहीं जाओ मगर अच्छे मकां मिलते कहाँ हैं अब
हमारे दिल में आ जाओ, ये बेहतर हर ठिकाने से ||

पतंगों सा गिरा कटकर तेरी छत पर अरे क़ातिल
कि बाहों उठाले तू किसी तरह बहाने से ||

हमारे नाम से साकी सभी को मय पिला देना
सितारे रतजगा के हैं थके -हारे जमाने से ||

परेशां हो पशेमां हो यही पूछे जवाबी ख़त
लिखावट क्यूँ नहीं जाती तेरे ख़त को जलाने से ||

लुटा शुहरत गवां दौलत मजे में ‘सारथी’ देखो
अमीरी है फ़कीरों सी घटेगा क्या लुटाने से ||

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