शनिवार, 8 अगस्त 2015

आहटे सुनता रहा हूँ

तुम गए कब यह मुझे आभास तक होता नहीं
मै तुम्हारे आगमन की आहट सुनता रहा हूँ
यह सदन पाकर तुम्हे जैसे की पूजा घर हुआ है
और यह कनक तुम्हारे नाम का अक्षय वर हुआ है
तुम मधुर तुम कंठ में गाओ
की मै शीतल रहूँगा
इसलिए सहकर चुभन पाटल
सदा चुनता रहा हूँ
तुम गए कब यह मुझे आभास तक होता नहीं
मै तुम्हारे आगमन की आहट सुनता रहा हूँ

मै तुम्हे अभिषक्त करने के लिए आतुर खड़ा हूँ
युँ समझ लो मै तुम्हारे गीत की अंतिम कड़ी हूँ
जिस घडी मुझको लगा यह कल नहीं आना कभी भी
उस घडी से मै जतन की चादर बुनता रहा हूँ
धुल समझो या की माटी
तुम मुझे कंचन बना दो
साथ गाने के लिए आतुर
मुझे तुम अपना बना लो
देवता के चरण से आकर
गिरा वह फूल हूँ मै
किन्तु प्रतिमा के अगोचर गुण सदा सुनता रहा हूँ

कनक श्रीवास्तव

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