तुम गए कब यह मुझे आभास तक होता नहीं
मै तुम्हारे आगमन की आहट सुनता रहा हूँ
यह सदन पाकर तुम्हे जैसे की पूजा घर हुआ है
और यह कनक तुम्हारे नाम का अक्षय वर हुआ है
तुम मधुर तुम कंठ में गाओ
की मै शीतल रहूँगा
इसलिए सहकर चुभन पाटल
सदा चुनता रहा हूँ
तुम गए कब यह मुझे आभास तक होता नहीं
मै तुम्हारे आगमन की आहट सुनता रहा हूँ
मै तुम्हे अभिषक्त करने के लिए आतुर खड़ा हूँ
युँ समझ लो मै तुम्हारे गीत की अंतिम कड़ी हूँ
जिस घडी मुझको लगा यह कल नहीं आना कभी भी
उस घडी से मै जतन की चादर बुनता रहा हूँ
धुल समझो या की माटी
तुम मुझे कंचन बना दो
साथ गाने के लिए आतुर
मुझे तुम अपना बना लो
देवता के चरण से आकर
गिरा वह फूल हूँ मै
किन्तु प्रतिमा के अगोचर गुण सदा सुनता रहा हूँ
कनक श्रीवास्तव
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