सोमवार, 3 अगस्त 2015

अपनाना न चाहा।

अपनाना न चाहा।

हमने तो उसे,
जान से भी ज्यदा चाह,
पर उसने मुझे अपना,
बनाना न चाह,

निकल गई आवज,
बतों ही बातो मे,
पर उसने दिल की बात,
बताना न चाह,

खुदा ने भी हमें कभी,
हंसाना न चाहा,
पर उसने भी दिल से दिल को,
मिलना न चाहा,

हम तो पहले ही भिग गये,
आंसुओं की बारीस में,
पर उसने इन आंसुओं को,
अपनाना न चाहा ।

संदीप कुमार सिंह ।
तेजपुर विश्वविद्यालय
हिन्दी विभाग,तेजपुर

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