गजल
उनकी नजरअंदाज में भी आता है प्यार मुझे
सामने हों तो बेमौषम भी लगता है बहार मुझे
क्या इसी को कहते है मोहब्बत बताओ दीवानो
उनकी हर इंकार भी लगता है क्यों इकरार मुझे
चाँद को आदत है छुप जाने की बादलो में हरदम
क्यों नकाब के पीछे भी लगता है हुई दीदार मुझे
न गुफ्तगू हुई, न मुलाक़ात कैसे कहूँ खुदाहफीज
अमावस में कैसे चाँद निकले फिर भी है इन्तजार मुझे
पड़ी होंगी कही झूले पर बेफिक्र मूंदकर आँखे अपनी
दीदार न हुई साये की तो लगता है दिल में तलवार मुझे
११-०४-२०१५
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