सोमवार, 3 अगस्त 2015

गजल

गजल

उनकी नजरअंदाज में भी आता है प्यार मुझे
सामने हों तो बेमौषम भी लगता है बहार मुझे

क्या इसी को कहते है मोहब्बत बताओ दीवानो
उनकी हर इंकार भी लगता है क्यों इकरार मुझे

चाँद को आदत है छुप जाने की बादलो में हरदम
क्यों नकाब के पीछे भी लगता है हुई दीदार मुझे

न गुफ्तगू हुई, न मुलाक़ात कैसे कहूँ खुदाहफीज
अमावस में कैसे चाँद निकले फिर भी है इन्तजार मुझे

पड़ी होंगी कही झूले पर बेफिक्र मूंदकर आँखे अपनी
दीदार न हुई साये की तो लगता है दिल में तलवार मुझे

११-०४-२०१५

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