उसे भी हक दो,वह उड़ना चाहती है.
उसकी परवाजें भी तुम्हारी तरह,
आसमान को छूना चाहती है.
क्यों अनचाहे झपट्टे से उसके
हौसले को तोड़ना चाहते हो?
देखो तो सही,वह कितना डर गई है.
रात भर उसकी पनीली आँखों मे
तुम्हारा ही खौफ तैरता रहा.
क्या जीने का हक केवल तुम्हारा है?
तुम्हे मालूम भी है,
कल से उसने ना चुग्गा खाया,
ना पानी पिया.
अब भोर हो गई है
अब तो बीती बातें बिसार दो.
उसको आवाज दो,हौंसला दो.
वह भी तुम्हारी तरह स्वछन्द होकर,
असीम और अनन्त आसमान की
ऊँचाइयों को छूना चाहती है.
“मीना भारद्वाज”
शुक्रवार, 7 अगस्त 2015
"उड़ान"
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