सोमवार, 10 अगस्त 2015

एक चाह

कौन है तू , क्या है तू ,मैं कभी ना समझ पाया,
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मैने ना सोचा था कि तेरे उस मिलाप का आज ये सिला होगा,
कि अब मैं यूं रोज़ ही खुद से विलाप करता फिरूँगा ।
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मुझे ना थी तुझसे कोई मिलने की चाहत,
मुझे ना थी तुझसे कोई बात करने की चाहत, तो आज मैं ही क्यूँ तुझमैं एसे जीता फिरता हूँ,
तो आज मैं ही क्यूँ तुझमैं एसे मरता फिरता हूँ ।
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तूने ना दिया कभी खुद से मिलने का मौका,
तूने ना दिया कभी खुद से बात करने का मौका,
तूने ना दिया कभी शिकवे करने करने का मौका,
तो फिर दिल आज भी यूं मिलन के ख्वाबों मैं ही क्यूँ जीता है ।
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क्या चाहती है तू मुझसे,
मैँ ना जान पाया।
क्या पाया है तुझसे मिलकर ,
मैनें ना जानना चाहा।
दुख के सिवाए और दिया ही क्या है तुमने मुझे।
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तुझे हँसते देखना तमन्ना है मेरी,
तुझे यूँ सबसे दूर ‘जन्नत’ में रखने की तमन्ना है मेरी।
तेरा वो हँसता चैहरा सामने बसता है मेरे,
फिर क्यूँ यू शक से भर देती है मुझे,
फिर क्यूँ यूँ रोता हुआ छोड देती है मुझे……………….

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