इश्क़ में जब से हम गिरफ़्तार हो गए |
पल में जमाने भर के गुनहगार हो गए ||
रूठना नहीं अब मनाना हमें आता है,
पहले से ज़्यादा हम समझदार हो गए ||
ख़बर जो फैली मेरे इश्क़ होने की,
सबकी नज़र में हम बेकार हो गए ||
हँसके जो उनकी तारीफ़ क्या कर दी,
वो कहते हैं हम बड़े कलाकार हो गए ||
जुबान पर रहती थी इंकलाबी बातें कभी,
वक़्त के साथ हम भी बीमार हो गए ||
राहे-महोब्बत का असर तो देखिए ‘माही’,
दोस्त भी दुश्मन भी बेशुमार हो गए ||
Read Complete Poem/Kavya Here इश्क़ में जब से ..... / गज़ल / महेश कुमार कुलदीप 'माही'
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