यूँ सरेआम मुझपर न अंगुल उठाओ |
मेरे गुनाह का कोई सबब बताओ ||
ज़िंदा हूँ अभी ख़ाक में मिलना बाकी है,
मेरे साथ थोड़ा तो अदब दिखाओ ||
उठ न पाऊँगा अपना रुतबा बचाकर,
मुझे नज़रों से तुम इस तरह न गिराओ ||
है बाज़ार में मेरा मकान लेकिन,
बेआबरू होने की तोहमत न लगाओ ||
आग के खेल में घर जला करते हैं,
बेपरवाही ना तुम इस तरह दिखाओ ||
माना के हज़ार खामियाँ है मुझमें,
भूलने दो मुझे बार-बार न गिनाओ ||
:- महेश कुमार कुलदीप ‘माही’
जयपुर, राजस्थान
+918511037804

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