गली मोहल्ला पार करूँ मैं,
देखण को परदेस चला ।
ना तो मिलिया यार कहीं पे,
ना दिल को सुकून मिला ।
जब-जब बाहर देखण लागा,
यार नहीं कुछ और मिला ।१।
जिस पल मैंने भीतर झाँका,
यार मुझे भरपूर मिला ।।
मैं तो बन्दे बड़ा भुलक्कड़,
रंग देखणे भाग रहा ।
कई रंग से मैं रंगा हूँ,
सतरंगी मै भूल रहा ।
मै खुद बैठा रंग समेटें,
और देखणे रंग चला ।२।
जिस पल मैंने भीतर झाँका,
यार मुझे भरपूर मिला ।।
मै तो कब से बँधा पड़ा हूँ,
गाँठ खोलनें तरस रहा ।
जन-जन से मै बिनती करके,
उलझन मेरी बढ़ा रहा ।
मै ही जाणु गुथ्थि फिरभी,
गाँठ खुलाने कहीं चला ।३।
जिस पल मैंने भीतर झाँका,
यार मुझे भरपूर मिला ।।
भीतर का जो यार मिले तो,
हर कण-कण में यार मिलें ।
यार मुझिमें, मै यारा में,
फिर कहे का भेद रहें ।
भीतर-बाहर मै ही मै हूँ,
यारा मै खुद यार बना ।४।
जिस पल मैंने भीतर झाँका ,
यार मुझे भरपूर मिला ।।

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