रिश्तो के इस भीड़ में अंजना सा खड़ा हूँ मै
अपनों के ही बीच मे अपनापन ढूंढ रहा हूँ मै
यह अजीब सी विवशता है मेरी
कहने को तू सब है अपने
आज जरुरत है मुझे , पर एक नाम नहीं है अपना
किस्से करू मै अब शिकायत , कौन सुनेगा मेरी यह फरियाद
रिश्तो के इस भीड़ में बेगाना सा खड़ा हूँ मै
अपनों के ही बीच मे अपनापन ढूंढ रहा हूँ मै
जब रिश्तो पर ही दरार पड़े है इतने
एक ही चेहरे पर कई चेहरे ओड़ लेते है रिश्ते
किस किस को उनका फर्ज याद दिलाएंगे यह रिश्ते
जब रिश्तो से ही खून टपकने है इतने
ठिठक कर खड़ा हो जाता हूँ मै
रिश्तो के इस भीड़ मे खो जाता हूँ मै
प्यार की खुसबू तो यहाँ दूर दूर तक मिलती नहीं
अपनापन का जमा धुंध कर भी डुंबध पाता नहीं
नफरत से भर गया अब मेरा ही यह दिल
सोच कर भी अब इनका कोई हल दीखता नहीं
रिश्तो के इस भीड़ में अंजना सा खड़ा हूँ मै
अपनों के बीच में अपनापन ढूंढ रहा हूँ मै
अगर वर्ष , महीने दिन गुजर कर भी रिश्तो को
मजबूत न कर पाया , तो मै क्या मेरी हस्ती क्या
धर्म क्या , फर्ज क्या रिश्ते क्या फिर
यदि मुझको ही सीखाने है रिश्तो को एक आयाम देना
तो बेहतर है उसे उन झीनी पर्दो में ही यु ही पड़े रहने दूँ
तो बेहतर है उसे उन झीनी पर्दो में यु ही रहने दूँ |
कनक श्रीवास्तवा
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