सोमवार, 3 अगस्त 2015

फूल

यह फूल मुझे कोई विरासत में मिले है क्या
तुमने मेरे काटो भरा बिस्तर नहीं देखा
फूल से आशिकी का हुनर तू सीख ले
तितलिया खुद ही रुकेगी सदाये ना दी |
किसके आंसू छिपे है फूलो में
चूमता हूँ तू होठ मेरे जलते है
उस दिन पहल;अ फूल खिला जब पतझर में
पत्ती पत्ती जोड़कर तेरा नाम लिखा
वह जो रंग चमकता है उस टहनी पर |

हाथ आये तो फूल , नहीं तू टाइटल है
फूल सा कुछ कलम और सही
एक गजल उसके नाम और सही
पंखुड़ी पंखुड़ी सलाम किये
फूल ही है कोई लिफाफा है क्या |

हलकी हलकी बारिश होती रही
हम भी फूलो की तरह भींगते रहे
सोने के फूल पत्ते गिरेंगे जमीन पर
मै जर्रा जर्रा शाखों में जब गुनगाउंगा
फूल की आँखों में शबनम क्यों है |
सब हमारी ही खता है जैसे ऐसा क्यों है
जहा वादियों में नए फूल आएंगे
हमारी तुम्हारी मुलाकात के दिन भी आएंगे

धुप का प्यार ख़ूबसूरत है
आज के फूल सी जैसे सुहाने है
वह चंद जब मेरी पलकों पर अपना फूल रखेगा
मै अपने बच्चे को एक नया आसमा दूंगा

यह िनयते , यह नवाजिशे
तेरा शुक्रिया कैसे अदा करू
सरे राह फूल बिछा दिए है
मै मेरे इन आंसुओ का अब क्या करू
मै उसका फूल हूँ , लेकिन खिला हूँ जंगल में
हवा की तरह जो आये तो बिखर जाऊ मै
इन ही हवाओ में |
मोहब्बत से , इनायत से . वफ़ा से अब चोट लगती है
बिखरा हुआ फूल हूँ मै मुझको हवा से अब चोट लगती है
कभी सात रंगो का फूल हूँ |
कभी धुप हूँ , तो कभी धुल हूँ
मै अब तमाम कपडे बदल चूका हूँ
तेरे मौसम के बारात में |
कोई फूल धुप की पत्तियों में
हरे रिबन से बंधा हुआ है
वह गजल का लहजा नया नया
ना कभी कहा गया और ना कभी सुना गया |

चाहे कोई मौसम हो, दिन गयी बहारो के
फिर से लौट आएंगे |
एक फूल तुम हो मेरी , जरा एक पत्ती अपने होठो
पर रख कर मेरे होठो पर रख दो |

कनक श्रीवास्तवा

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